पहाड़ की चोटी
क्या वह खतरनाक रास्ते पर बढ़े या सुरक्षित लौटे।
Beginning
मेरे पिताजी की आख़िरी इच्छा एक पहाड़ थी।
मेरा नाम कार्तिक है। मेरे पिताजी, विक्रम सिंह, एक पर्वतारोही थे। उन्होंने ज़िंदगी भर कई पहाड़ चढ़े, पर एक चोटी हमेशा उनके सपनों में रह गई — श्वेतशिखर। बर्फ़ से ढका वह ऊँचा, ख़ूबसूरत, पर ख़तरनाक पहाड़। जवानी में वे दो बार उसे चढ़ने गए, पर दोनों बार मौसम ने उन्हें लौटा दिया। फिर ज़िंदगी की ज़िम्मेदारियाँ आईं — नौकरी, परिवार, मैं। और श्वेतशिखर एक अधूरा सपना बनकर रह गया।
पिछले साल, जब वे बीमारी से लड़ रहे थे, तो एक शाम उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। "कार्तिक," उन्होंने कमज़ोर आवाज़ में कहा, "मेरे लिए एक काम करेगा? श्वेतशिखर की चोटी पर जाना। वहाँ मेरा यह पुराना लाल मफ़लर बाँध देना, और मेरी थोड़ी राख वहाँ की हवा में बिखेर देना। मैं वह नज़ारा देखना चाहता था, जो मैंने कभी नहीं देखा। तू मेरी आँखें बनकर उसे देख लेना।"